चेरेवैती...चेरेवैती यानी चलते रहें, चलते रहें. मन को सुकून देती है

यायावरी की यादें ... कैमरे ने जो देखा लिख दिया...स्म्रति के द्र्श्यलेखों को पढ़ें

आप भी..

Photos Copyright : Dr. Rajesh Kumar Vyas


Friday, April 8, 2011

नेहरु गार्डेन की भोर

जयपुर में बच्चों के लिए एक पार्क है नेहरु गार्डेन.  एक सुबह नीहार के साथ पार्क में घूमते सुना पक्षियों का कलरव...सुहानी भोर में और भी बहुत कुछ था वहां. कैमरा वंहा जा ही नहीं सका.  जहाँ गया, वह यहाँ आपके लिए...







Saturday, March 26, 2011

जयपुर का जंतर-मंतर

यह  जयपुर का जंतर-मंतर है. सवाई जयसिंह ने इस वेधशाला का निर्माण 1734 में जयपुर स्थापना के समय करवाया था.  तब सूर्योदय,  सूर्यास्त और नक्षत्रों के साथ ही समय के  बारे में यहाँ के यंत्रों से ही जानकारी मिला करती थी. जयपुर के बाद उज्जैन, बनारस और मथुरा में भी वैध्शालायें बनवाई गयी.
जयपुर के जन्तर-मंतर में सवाई जयसिंह द्वारा निर्मित आविषकृत तीन यंत्र सम्राट, जयप्रकाश और रामयंत्र प्रमुख है.  आज के इस वैज्ञानिक समय में भी जंतर-मंतर की वैज्ञानिकता समय की गणना के रूप में कम नहीं है. हाल ही जयपुर के इस जंतर-मंतर को यूनेस्को ने विश्व धरोहर में शुमार किया है.








Wednesday, March 16, 2011

अल्बर्ट हाल निहार



विश्व का सुनियोजित शहर है गुलाबी नगरी जयपुर. अल्बर्ट हॉल रामनिवास बाग़ की शान है...खूबसूरती की मिशाल! आइये निहारें इसे कैमरे की आँख से ..









Sunday, February 27, 2011

कहीं नहीं, यहीं..

हमारे आस-पास ही है बहुत कुछ.  मेने देखा घर के लोन में ही खिले थे भान्त-भान्त के फूल, कलियाँ.     ...और वह भी जिसकी होती है हमें चाह.  कहीं नहीं, यहीं..





Friday, February 25, 2011

"तानसेन सिरमोर रसिक जन के...".

यह ग्वालियर है...तानसेन की धरा. यहीं होता है प्रतिवर्ष तानसेन समारोह.  कोई तीनेक साल पहले मध्यप्रदेश की अलाउदीन खां संगीत एवं कला अकादेमी की ओर  से  खाकसार भी आमंत्रित हुआ था इस समारोह के लिए,बतौर कला समीक्षक. 
तानसेन संगीत समारोह  में  हरिप्रसाद   चौरसिया  के  साथ  ही  ख्यातनाम  दूजे  कलाकारों को भी सुना पर कहीं पढ़ा तब भी याद आ ही रहा था,  "तानसेन सिरमोर रसिक जन के...". गवालियर के किल्ले पर भी चढ़ा...अतीत को निहारा वर्तमान की इस आँख से. केमरे ने लिखे द्रश्य...















Thursday, February 24, 2011

कीईनपारा में सुनते हुए पाषाण!


कीईनपारा  यानी कोणार्क! उड़ीसा के समुन्द्र तट पर स्थित स्थापत्यकला का अप्रतिम मंदिर. वर्ष 2009 के  10 अक्टूबर को पूरे  दिन यहीं था.    रह रह कर बारिश भिगो रही थी शिल्प सोंदर्य के इस पावन धाम को.    पाषाणों पर गिरती बुँदे धो रही थी, उन पर जमी धुल.     कोर्णाक के  भग्न सूर्य मंदिर में विचरते मैं सुनने लगा था, पथरों पर उत्कीर्ण न्र्त्यान्ग्नाओं के नुपुर की झंकार. कानों में बजने लगे थे बहुत से  साज...मरदंग, बांसुरी, नुपुर और ढोलक.   टप-टप गिरती बारिश की बूंदों में भीग रहा था कोणार्क...उसके सोंदर्य में तब सच में  नहा रहा था यह मन....यह यायावरी ही है जो इतना   कुछ देती है...